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DAYANAND ANGLO-VEDIC COLLEGE TRUST & MANAGEMENT SOCIETY

“DAV MOVEMENT” founded in 1885 is the largest Non-Government Educational Organization in the country, managing over 700 education institutions. DAV Institution have rendered a unique service, in not only dispelling ignorance and illiteracy but also in producing Patriots, Freedom-Fighter, Social Reformers, Intellectual, Thinkers, Legal Luminaries, Doctors and Engineers of in paralleled merit, integrity and caliber..

DAYANAND
     
 ANGLO VEDIC
 Knowledge of Conquer Space Wisdom to Conquer Onself
 Learning to Admire Virtue Aspiring to become Virtuous
 Getting Rich by Acquiring Wealth Getting Rich by Renouncing Riches
 Aspiring to become Faraday Aspiring to become a Buddha
 Knowing what we did not know Acting as we did not act
DEDICATED SOULS
     
SWAMI DAYANAND SARASWATI LALA LAJPAT RAJ MAHATMA HANSRAJ
The founder of the ARYA SAMAJ
(The great path-maker of modern India)
The great soul who founded and nurtured the DAV Movement Who fulfilled his pledge of 20 years honorary service as first principal of the first DAV College at Lahore

आर्य समाज के दस नियम

  • 1.सब सत्यिध्या और जो पदार्थ विध्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है ।
  • 2. ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, चर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है ।
  • 3. वेद सब सत्यविध्याओं का पुस्तक है । वेद का पढ़ाना - पढ़ाना और सुनना - सुनाना सब आर्यो का परम धर्म है ।
  • 4. सत्य के ग्रहण करने और उसत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत् रहना चाहिएँ ।
  • 5. सब काम धर्मानुसार, अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिएँ ।
  • 6. सँसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्धेश्य है, अर्थात् शारीरिक्, आत्मिक और सामाजिक् उन्नति करना ।
  • 7. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिए ।
  • 8. अविध्या का नाश विध्या कि दृध्दि करनि चाहिए ।
  • 9. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिए, किन्तु सब की उन्नती सें अपनी उन्नति समझनी चाहिए ।
  • 10. सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वाहितकारी, नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए आर प्रत्येक हितकारी नियम पालने सब स्वतंत्र रहें ।